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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
अहं तु तान्कुरुवृषभानजिह्मगैः; प्रवेरय़न्यमसदनं रणे चरन् |  १५   क
यशः परं जगति विभाव्य वर्तिता; परैर्हतो युधि शय़िताथ वा पुनः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति