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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
स्थिरा वुद्धिर्हि द्रोणस्य न पार्थो वक्ष्यतेऽनृतम् |  ९५   क
त्रय़ाणामपि लोकानामैश्वर्यार्थे कथञ्चन ||  ९५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति