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द्रोण पर्व
अध्याय १७३
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व्यास उवाच
त्रिशूलपाणिं वरदं खड्गचर्मधरं प्रभुम् |  ३३   क
पिनाकिनं खण्डपरशुं लोकानां पतिमीश्वरम् |  ३३   ख
प्रपद्ये शरणं देवं शरण्यं चीरवाससम् ||  ३३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति