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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय ५
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धृतराष्ट्र उवाच
यच्चाहं वासुदेवस्य वाक्यं नाश्रौषमर्थवत् |  ३   क
वध्यतां साध्वय़ं पापः सामात्य इति दुर्मतिः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति