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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
सर्वांश्च समरे राजन्किरीटी क्षत्रिय़र्षभान् |  ७   क
परिचिक्षेप वीभत्सुः सर्वतः प्रक्षिपञ्शरान् ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति