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भीष्म पर्व
अध्याय ५०
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सञ्जय़ उवाच
भीमसेनश्चरन्मार्गान्सुवहून्प्रत्यदृश्यत |  ४५   क
भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं प्रसृतं सृतम् |  ४५   ख
सम्पातं समुदीर्यं च दर्शय़ामास पाण्डवः ||  ४५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति