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वन पर्व
अध्याय ६८
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वृहदश्व उवाच
अय़मर्थो न संवेद्यो भीमे मातः कथञ्चन |  १४   क
त्वत्संनिधौ समादेक्ष्ये सुदेवं द्विजसत्तमम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति