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आदि पर्व
अध्याय १५४
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व्राह्मण उवाच
द्रोणः शिष्यांस्ततः सर्वानिदं वचनमव्रवीत् |  १८   क
समानीय़ तदा विद्वान्द्रुपदस्यासुखाय़ वै ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति