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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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युधिष्ठिर उवाच
स्वाध्याय़कृतय़त्नस्य व्राह्मणस्य पितामह |  १   क
धर्मकामस्य धर्मात्मन्किं नु श्रेय़ इहोच्यते ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति