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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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भीष्म उवाच
दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम |  १०   क
दमो हि परमो लोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति