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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
मा स्प्राक्षीः सधु जानीष्व स्वशास्त्रमनुपालय़ |  ७०   क
कृतेय़ं हि विजिज्ञासा मुक्तो नेति त्वय़ा मम |  ७०   ख
एतत्सर्वं प्रतिच्छन्नं मय़ि नार्हसि गूहितुम् ||  ७०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति