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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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युधिष्ठिर उवाच
वहुधादर्शने लोके श्रेय़ो यदिह मन्यसे |  २   क
अस्मिँल्लोके परे चैव तन्मे व्रूहि पितामह ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति