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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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भीष्म उवाच
सर्वा ग्राम्यास्तथारण्या याश्च लोके प्रवृत्तय़ः |  २१   क
निन्दां चैव प्रशंसां च यो नाश्रय़ति मुच्यते ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति