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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
अन्तकाले वय़ोत्कर्षाच्छनैः कुर्यादनातुरः |  २०   क
एवं युक्तेन मनसा ज्ञानं तदुपपद्यते ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति