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शान्ति पर्व
अध्याय १५४
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भीष्म उवाच
कामेषु चाप्यनावृत्तः प्रसन्नात्मात्मविच्छुचिः |  ३१   क
प्राप्येह लोके सत्कारं स्वर्गं समभिपद्यते ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति