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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
संस्कृत्य च कुरुश्रेष्ठं गाङ्गेय़ं कुरुसत्तमाः |  १५   क
जग्मुर्भागीरथीतीरमृषिजुष्टं कुरूद्वहाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति