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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
राजवृत्तेन सम्पन्नः प्रज्ञय़ाभिजनेन च |  २०   क
सत्कर्ता कुरुवृद्धानां पितृभक्तो दृढव्रतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति