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आदि पर्व
अध्याय ६४
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वैशम्पाय़न उवाच
तत्स चैत्ररथप्रख्यं समुपेत्य नरेश्वरः |  २५   क
अतीव गुणसम्पन्नमनिर्देश्यं च वर्चसा |  २५   ख
महर्षिं काश्यपं द्रष्टुमथ कण्वं तपोधनम् ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति