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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
यस्य नास्ति वले तुल्यः पृथिव्यामपि कश्चन |  २४   क
हतं शिखण्डिना श्रुत्वा यन्न दीर्यति मे मनः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति