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द्रोण पर्व
अध्याय १३८
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सञ्जय़ उवाच
शस्त्रप्रभाभिश्च विराजमानं; दीपप्रभाभिश्च तदा वलं तत् |  २०   क
प्रकाशितं चाभरणप्रभाभि; र्भृशं प्रकाशं नृपते वभूव ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति