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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मान्मा त्वं सरिच्छ्रेष्ठे शोचस्व कुरुनन्दनम् |  ३२   क
वसूनेष गतो देवि पुत्रस्ते विज्वरा भव ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति