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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
संनिरुद्धस्तु तेनात्मा सर्वेष्वाय़तनेषु वै |  ५   क
जगाम भित्त्वा मूर्धानं दिवमभ्युत्पपात च ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति