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अनुशासन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
महोल्केव च भीष्मस्य मूर्धदेशाज्जनाधिप |  ६   क
निःसृत्याकाशमाविश्य क्षणेनान्तरधीय़त ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति