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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
स त्वं प्रतिश्रय़ेऽस्माकं पूज्यमानः सुखोषितः |  १४   क
भुक्त्वा चान्नानि दुष्प्रज्ञ कथमस्माञ्जिहीर्षसि ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति