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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
अथ चेत्त्वमविज्ञाय़ इदं कर्म करिष्यसि |  १७   क
अधर्मं चाप्यकीर्तिं च लोके प्राप्स्यसि केवलम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति