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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
रहितान्भीमसेनेन कदाचित्तान्यदृच्छय़ा |  २   क
जहार धर्मराजानं यमौ कृष्णां च राक्षसः ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति