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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
अथाव्रवीद्द्रौपदीं च नकुलं च युधिष्ठिरः |  २०   क
मा भैष्ट राक्षसान्मूढाद्गतिरस्य मय़ा हृता ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति