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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
सहदेवस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं मूढचेतसम् |  २२   क
उवाच वचनं राजन्कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति