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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
राक्षसे जीवमानेऽद्य रविरस्तमिय़ाद्यदि |  २६   क
नाहं व्रूय़ां पुनर्जातु क्षत्रिय़ोऽस्मीति भारत ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति