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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
सोऽपश्यद्भ्रातरौ तत्र द्रौपदीं च यशस्विनीम् |  २९   क
क्षितिस्थं सहदेवं च क्षिपन्तं राक्षसं तदा ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति