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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्रातॄंस्तान्ह्रिय़तो दृष्ट्वा द्रौपदीं च महावलः |  ३१   क
क्रोधमाहारय़द्भीमो राक्षसं चेदमव्रवीत् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति