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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
विज्ञातोऽसि मय़ा पूर्वं चेष्टञ्शस्त्रपरीक्षणे |  ३२   क
आस्था तु त्वय़ि मे नास्ति यतोऽसि न हतस्तदा |  ३२   ख
व्रह्मरूपप्रतिच्छन्नो न नो वदसि चाप्रिय़म् ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति