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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
अपक्वस्य च कालेन वधस्तव न विद्यते |  ३४   क
नूनमद्यासि सम्पक्वो यथा ते मतिरीदृशी |  ३४   ख
दत्ता कृष्णापहरणे कालेनाद्भुतकर्मणा ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति