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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
यं चासि प्रस्थितो देशं मनः पूर्वं गतं च ते |  ३६   क
न तं गन्तासि गन्तासि मार्गं वकहिडिम्वय़ोः ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति