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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवमुक्तस्तु भीमेन राक्षसः कालचोदितः |  ३७   क
भीत उत्सृज्य तान्सर्वान्युद्धाय़ समुपस्थितः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति