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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
न्यवारय़त्तौ प्रहसन्कुन्तीपुत्रो वृकोदरः |  ४३   क
शक्तोऽहं राक्षसस्येति प्रेक्षध्वमिति चाव्रवीत् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति