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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
आत्मना भ्रातृभिश्चाहं धर्मेण सुकृतेन च |  ४४   क
इष्टेन च शपे राजन्सूदय़िष्यामि राक्षसम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति