वन पर्व  अध्याय ९४

लोमश उवाच

ववृधे सा महाराज विभ्रती रूपमुत्तमम् |  २२   क
अप्स्विवोत्पलिनी शीघ्रमग्नेरिव शिखा शुभा ||  २२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति