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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्मिन्देशे यदा वृक्षाः सर्व एव निपातिताः |  ५१   क
पुञ्जीकृताश्च शतशः परस्परवधेप्सय़ा ||  ५१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति