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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
उग्राभिरुग्ररूपाभिर्वृहतीभिः परस्परम् |  ५३   क
वज्रैरिव महावेगैराजघ्नतुरमर्षणौ ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति