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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः संहृत्य मुष्टिं तु पञ्चशीर्षमिवोरगम् |  ५६   क
वेगेनाभ्यहनद्भीमो राक्षसस्य शिरोधराम् ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति