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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततः श्रान्तं तु तद्रक्षो भीमसेनभुजाहतम् |  ५७   क
सुपरिश्रान्तमालक्ष्य भीमसेनोऽभ्यवर्तत ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति