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वन पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
तस्य गात्राणि सर्वाणि चूर्णय़ामास पाण्डवः |  ५९   क
अरत्निना चाभिहत्य शिरः काय़ादपाहरत् ||  ५९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति