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वन पर्व
अध्याय २४
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वैशम्पाय़न उवाच
द्विजातिमुख्याः सहिताः पृथक्च; भवद्भिरासाद्य तपस्विनश्च |  १४   क
प्रसाद्य धर्मार्थविदश्च वाच्या; यथार्थसिद्धिः परमा भवेन्नः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति