उद्योग पर्व  अध्याय १५४

जनमेजय़ उवाच

वृहस्पतिसमं वुद्ध्या क्षमय़ा पृथिवीसमम् |  २   क
समुद्रमिव गाम्भीर्ये हिमवन्तमिव स्थिरम् ||  २   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति