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उद्योग पर्व
अध्याय १५४
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वैशम्पाय़न उवाच
न चाहमुत्सहे कृष्णमृते लोकमुदीक्षितुम् |  ३१   क
ततोऽहमनुवर्तामि केशवस्य चिकीर्षितम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति