शल्य पर्व  अध्याय ४०

वैशम्पाय़न उवाच

मांसैरपि जुहावेष्टिमक्षीय़न्त ततोऽसुराः |  २७   क
दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे ||  २७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति