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उद्योग पर्व
अध्याय १५४
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जनमेजय़ उवाच
रणय़ज्ञे प्रतिभय़े स्वाभीले लोमहर्षणे |  ४   क
दीक्षितं चिररात्राय़ श्रुत्वा राजा युधिष्ठिरः ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति