सौप्तिक पर्व  अध्याय ५

कृप उवाच

अनेय़स्त्ववमानी यो दुरात्मा पापपूरुषः |  ४   क
दिष्टमुत्सृज्य कल्याणं करोति वहुपापकम् ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति