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द्रोण पर्व
अध्याय १५४
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सञ्जय़ उवाच
निहत्यालाय़ुधं रक्षः प्रहृष्टात्मा घटोत्कचः |  १   क
ननाद विविधान्नादान्वाहिन्याः प्रमुखे स्थितः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति